श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.51.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 51 · अथैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

वरान् वृणीष्व राजर्षे सर्वान् कामान् ददामि ते।

मां प्रपन्‍नो जनः कश्‍चिन्‍न भूयोऽर्हति शोचितुम्॥ ४४

varān vṛṇīṣva rājarṣe sarvān kāmān dadāmi te|

māṃ prapanno janaḥ kaścinna bhūyo'rhati śocitum|| 44

अर्थ

इसलिये राजर्षे! तुम्हारी जो अभिलाषा हो, मुझसे माँग लो। मैं तुम्हारी सारी लालसा, अभिलाषाएँ पूर्ण कर दूँगा। जो पुरुष मेरी शरणमें आ जाता है उसके लिये फिर ऐसी कोई वस्तु नहीं रह जाती, जिसके लिये वह शोक करे॥ ४४॥

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