रणछोड़ भगवान् लीला करते हुए भाग रहे थे; कालयवन पग-पगपर यही समझता था कि अब पकड़ा, तब पकड़ा। इस प्रकार भगवान् उसे बहुत दूर एक पहाड़की गुफामें ले गये॥ ७॥
हस्तप्राप्तमिवात्मानं हरिणा स पदे पदे।
नीतो दर्शयता दूरं यवनेशोऽद्रिकन्दरम्॥ ७
रणछोड़ भगवान् लीला करते हुए भाग रहे थे; कालयवन पग-पगपर यही समझता था कि अब पकड़ा, तब पकड़ा। इस प्रकार भगवान् उसे बहुत दूर एक पहाड़की गुफामें ले गये॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.51.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 453) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/51/7/