उसके आक्षेप करते रहनेपर भी भगवान् उस पर्वतकी गुफामें घुस गये। उनके पीछे कालयवन भी घुसा। वहाँ उसने एक दूसरे ही मनुष्यको सोते हुए देखा॥ ९॥
एवं क्षिप्तोऽपि भगवान् प्राविशद् गिरिकन्दरम्।
सोऽपि प्रविष्टस्तत्रान्यं शयानं ददृशे नरम्॥ ९
उसके आक्षेप करते रहनेपर भी भगवान् उस पर्वतकी गुफामें घुस गये। उनके पीछे कालयवन भी घुसा। वहाँ उसने एक दूसरे ही मनुष्यको सोते हुए देखा॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.51.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 453) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/51/9/