रुक्मिणीजीके भाई-बन्धु भी चाहते थे कि हमारी बहिनका विवाह श्रीकृष्णसे ही हो। परन्तु रुक्मी श्रीकृष्णसे बड़ा द्वेष रखता था, उसने उन्हें विवाह करनेसे रोक दिया और शिशुपालको ही अपनी बहिनके योग्य वर समझा॥ २५॥
बन्धूनामिच्छतां दातुं कृष्णाय भगिनीं नृप।
ततो निवार्य कृष्णद्विड् रुक्मी चैद्यममन्यत॥ २५
रुक्मिणीजीके भाई-बन्धु भी चाहते थे कि हमारी बहिनका विवाह श्रीकृष्णसे ही हो। परन्तु रुक्मी श्रीकृष्णसे बड़ा द्वेष रखता था, उसने उन्हें विवाह करनेसे रोक दिया और शिशुपालको ही अपनी बहिनके योग्य वर समझा॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.52.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 463) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/52/25/