श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

विप्रान् स्वलाभसंतुष्टान् साधून् भूतसुहृत्तमान्।

निरहंकारिणः शान्तान् नमस्ये शिरसासकृत्॥ ३३

viprān svalābhasaṃtuṣṭān sādhūn bhūtasuhṛttamān|

nirahaṃkāriṇaḥ śāntān namasye śirasāsakṛt|| 33

अर्थ

जो स्वयं प्राप्त हुई वस्तुसे सन्तोष कर लेते हैं, जिनका स्वभाव बड़ा ही मधुर है और जो समस्त प्राणियोंके परम हितैषी, अहंकाररहित और शान्त हैं—उन ब्राह्मणोंको मैं सदा सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ॥ ३३॥✎ 890

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #890 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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