kaccid vaḥ kuśalaṃ brahman rājato yasya hi prajāḥ|
sukhaṃ vasanti viṣaye pālyamānāḥ sa me priyaḥ|| 34
अर्थ
ब्राह्मणदेवता! राजाकी ओरसे तो आपलोगोंको सब प्रकारकी सुविधा है न? जिसके राज्यमें प्रजाका अच्छी तरह पालन होता है और वह आनन्दसे रहती है, वह राजा मुझे बहुत ही प्रिय है॥ ३४॥✎ 890
कच्चिद् वः कुशलं ब्रह्मन् राजतो यस्य हि प्रजाः।
सुखं वसन्ति विषये पाल्यमानाः स मे प्रियः॥ ३४
ब्राह्मणदेवता! राजाकी ओरसे तो आपलोगोंको सब प्रकारकी सुविधा है न? जिसके राज्यमें प्रजाका अच्छी तरह पालन होता है और वह आनन्दसे रहती है, वह राजा मुझे बहुत ही प्रिय है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.52.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 464) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/52/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)