श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.52.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 52 · अथ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

विलोक्य वेगरभसं रिपुसैन्यस्य माधवौ।

मनुष्यचेष्टामापन्‍नौ राजन् दुद्रुवतुर्द्रुतम्॥ ७

vilokya vegarabhasaṃ ripusainyasya mādhavau|

manuṣyaceṣṭāmāpannau rājan dudruvaturdrutam|| 7

अर्थ

परीक्षित्! शत्रु-सेनाका प्रबल वेग देखकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम मनुष्योंकी-सी लीला करते हुए उसके सामनेसे बड़ी फुर्तीके साथ भाग निकले॥ ७॥✎ 1685

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1685 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: धरती-पर → धरतीपर

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