श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने विदर्भराजकुमारी रुक्मिणीजीका यह सन्देश सुनकर अपने हाथसे ब्राह्मणदेवताका हाथ पकड़ लिया और हँसते हुए यों बोले॥ १॥
वैदर्भ्याः स तु सन्देशं निशम्य यदुनन्दनः।
प्रगृह्य पाणिना पाणिं प्रहसन्निदमब्रवीत्॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने विदर्भराजकुमारी रुक्मिणीजीका यह सन्देश सुनकर अपने हाथसे ब्राह्मणदेवताका हाथ पकड़ लिया और हँसते हुए यों बोले॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.53.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 467) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/53/1/