श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

तथाहमपि तच्चित्तो निद्रां च न लभे निशि।

वेदाहं रुक्मिणा द्वेषान्ममोद्वाहो निवारितः॥ २

tathāhamapi taccitto nidrāṃ ca na labhe niśi|

vedāhaṃ rukmiṇā dveṣānmamodvāho nivāritaḥ|| 2

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—ब्राह्मणदेवता! जैसे विदर्भराजकुमारी मुझे चाहती हैं, वैसे ही मैं भी उन्हें चाहता हूँ। मेरा चित्त उन्हींमें लगा रहता है। कहाँतक कहूँ, मुझे रातके समय नींदतक नहीं आती। मैं जानता हूँ कि रुक्मीने द्वेषवश मेरा विवाह रोक दिया है॥ २॥✎ 2110

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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