श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तामानयिष्य उन्मथ्य राजन्यापसदान् मृधे।

मत्परामनवद्यांगीमेधसोऽग्‍निशिखामिव ॥ ३

tāmānayiṣya unmathya rājanyāpasadān mṛdhe|

matparāmanavadyāṃgīmedhaso'gniśikhāmiva || 3

अर्थ

परन्तु ब्राह्मणदेवता! आप देखियेगा, जैसे लकड़ियोंको मथकर—एक-दूसरेसे रगड़कर मनुष्य उनमेंसे आग निकाल लेता है, वैसे ही युद्धमें उन नामधारी क्षत्रियकुल-कलंकोंको तहस-नहस करके अपनेसे प्रेम करनेवाली परमसुन्दरी राजकुमारीको मैं निकाल लाऊँगा॥ ३॥✎ 2110

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