श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

उद्वाहर्क्षं च विज्ञाय रुक्मिण्या मधुसूदनः।

रथः संयुज्यतामाशु दारुकेत्याह सारथिम्॥ ४

udvāharkṣaṃ ca vijñāya rukmiṇyā madhusūdanaḥ|

rathaḥ saṃyujyatāmāśu dāruketyāha sārathim|| 4

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मधुसूदन श्रीकृष्णने यह जानकर कि रुक्मिणीके विवाहकी ल‌ग्‍न परसों रात्रिमें ही है, सारथिको आज्ञा दी कि ‘दारुक! तनिक भी विलम्ब न करके रथ जोत लाओ’॥ ४॥

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