परीक्षित्! जिस समय प्रेम-परवश होकर पुरवासीलोग परस्पर इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, उसी समय रुक्मिणीजी अन्तःपुरसे निकलकर देवीजीके मन्दिरके लिये चलीं। बहुत-से सैनिक उनकी रक्षामें नियुक्त थे॥ ३९॥✎ 1687
एवं प्रेमकलाबद्धा वदन्ति स्म पुरौकसः।
कन्या चान्तःपुरात् प्रागाद् भटैर्गुप्ताम्बिकालयम्॥ ३९
परीक्षित्! जिस समय प्रेम-परवश होकर पुरवासीलोग परस्पर इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, उसी समय रुक्मिणीजी अन्तःपुरसे निकलकर देवीजीके मन्दिरके लिये चलीं। बहुत-से सैनिक उनकी रक्षामें नियुक्त थे॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.53.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 471) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/53/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)