श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

एवं प्रेमकलाबद्धा वदन्ति स्म पुरौकसः।

कन्या चान्तःपुरात् प्रागाद् भटैर्गुप्ताम्बिकालयम्॥ ३९

evaṃ premakalābaddhā vadanti sma puraukasaḥ|

kanyā cāntaḥpurāt prāgād bhaṭairguptāmbikālayam|| 39

अर्थ

परीक्षित्! जिस समय प्रेम-परवश होकर पुरवासीलोग परस्पर इस प्रकार बातचीत कर रहे थे, उसी समय रुक्मिणीजी अन्तःपुरसे निकलकर देवीजीके मन्दिरके लिये चलीं। बहुत-से सैनिक उनकी रक्षामें नियुक्त थे॥ ३९॥✎ 1687

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1687 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरवासी-लोग → पुरवासीलोग

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