वे प्रेममूर्ति श्रीकृष्णचन्द्रके चरण-कमलोंका चिन्तन करती हुई भगवती भवानीके पाद-पल्लवोंका दर्शन करनेके लिये पैदल ही चलीं॥ ४०॥✎ 1687
पद्भ्यां विनिर्ययौ द्रष्टुं भवान्याः पादपल्लवम्।
सा चानुध्यायती सम्यङ्मुकुन्दचरणाम्बुजम्॥ ४०
वे प्रेममूर्ति श्रीकृष्णचन्द्रके चरण-कमलोंका चिन्तन करती हुई भगवती भवानीके पाद-पल्लवोंका दर्शन करनेके लिये पैदल ही चलीं॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.53.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 471) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/53/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)