श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.53.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 53 · अथ त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तां देवमायामिव वीरमोहिनीं

सुमध्यमां कुण्डलमण्डिताननाम्।

श्यामां नितम्बार्पितरत्‍नमेखलां

व्यञ्जत्स्तनीं कुन्तलशंकितेक्षणाम्॥ ५१

tāṃ devamāyāmiva vīramohinīṃ

sumadhyamāṃ kuṇḍalamaṇḍitānanām|

śyāmāṃ nitambārpitaratnamekhalāṃ

vyañjatstanīṃ kuntalaśaṃkitekṣaṇām|| 51

अर्थ

परीक्षित्! रुक्मिणीजी भगवान्‌की मायाके समान ही बड़े-बड़े धीर-वीरोंको भी मोहित कर लेनेवाली थीं। उनका कटिभाग बहुत ही सुन्दर और पतला था। मुखमण्डलपर कुण्डलोंकी शोभा जगमगा रही थी। वे किशोर और तरुण-अवस्थाकी सन्धिमें स्थित थीं। नितम्बपर जड़ाऊ करधनी शोभायमान हो रही थी, वक्षःस्थल कुछ उभरे हुए थे और उनकी दृष्टि लटकती हुई अलकोंके कारण कुछ चंचल हो रही थी॥ ५१॥

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