पूजा-अर्चाकी विधि समाप्त हो जानेपर उन्होंने मौनव्रत तोड़ दिया और रत्नजटित अँगूठीसे जगमगाते हुए करकमलके द्वारा एक सहेलीका हाथ पकड़कर वे गिरिजामन्दिरसे बाहर निकलीं॥ ५०॥
मुनिव्रतमथ त्यक्त्वा निश्चक्रामाम्बिकागृहात्।
प्रगृह्य पाणिना भृत्यां रत्नमुद्रोपशोभिना॥ ५०
पूजा-अर्चाकी विधि समाप्त हो जानेपर उन्होंने मौनव्रत तोड़ दिया और रत्नजटित अँगूठीसे जगमगाते हुए करकमलके द्वारा एक सहेलीका हाथ पकड़कर वे गिरिजामन्दिरसे बाहर निकलीं॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.53.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 472) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/53/50/