॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.53.8
पुरं सम्मृष्टसंसिक्तमार्गरथ्याचतुष्पथम्।
चित्रध्वजपताकाभिस्तोरणैः समलंकृतम्॥ ८
puraṃ sammṛṣṭasaṃsiktamārgarathyācatuṣpatham|
citradhvajapatākābhistoraṇaiḥ samalaṃkṛtam|| 8
अर्थ
नगरके राजपथ, चौराहे तथा गली-कूचे झाड़-बुहार दिये गये थे, उनपर छिड़काव किया जा चुका था। चित्र-विचित्र, रंग-बिरंगी, छोटी-बड़ी झंडियाँ और पताकाएँ लगा दी गयी थीं। तोरण बाँध दिये गये थे॥ ८॥