रुक्मीकी सेना और उसके तेजका नाश हो चुका था। केवल प्राण बच रहे थे। उसके चित्तकी सारी आशा-अभिलाषाएँ व्यर्थ हो चुकी थीं और शत्रुओंने अपमानित करके उसे छोड़ दिया था। उसे अपने विरूप किये जानेकी कष्टदायक स्मृति भूल नहीं पाती थी॥ ५१॥
प्राणावशेष उत्सृष्टो द्विड्भिर्हतबलप्रभः।
स्मरन् विरूपकरणं वितथात्ममनोरथः॥ ५१
रुक्मीकी सेना और उसके तेजका नाश हो चुका था। केवल प्राण बच रहे थे। उसके चित्तकी सारी आशा-अभिलाषाएँ व्यर्थ हो चुकी थीं और शत्रुओंने अपमानित करके उसे छोड़ दिया था। उसे अपने विरूप किये जानेकी कष्टदायक स्मृति भूल नहीं पाती थी॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 480) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/54/51/