कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामीत्युक्त्वा तत्रावसद् रुषा॥ ५२
cakre bhojakaṭaṃ nāma nivāsāya mahat puram|
ahatvā durmatiṃ kṛṣṇamapratyūhya yavīyasīm|
kuṇḍinaṃ na pravekṣyāmītyuktvā tatrāvasad ruṣā|| 52
अर्थ
अतः उसने अपने रहनेके लिये भोजकट नामकी एक बहुत बड़ी नगरी बसायी। उसने पहले ही यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि ‘दुर्बुद्धि कृष्णको मारे बिना और अपनी छोटी बहिनको लौटाये बिना मैं कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा।’ इसलिये क्रोध करके वह वहीं रहने लगा॥ ५२॥
चक्रे भोजकटं नाम निवासाय महत् पुरम्।
अहत्वा दुर्मतिं कृष्णमप्रत्यूह्य यवीयसीम्।
कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामीत्युक्त्वा तत्रावसद् रुषा॥ ५२
अतः उसने अपने रहनेके लिये भोजकट नामकी एक बहुत बड़ी नगरी बसायी। उसने पहले ही यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि ‘दुर्बुद्धि कृष्णको मारे बिना और अपनी छोटी बहिनको लौटाये बिना मैं कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा।’ इसलिये क्रोध करके वह वहीं रहने लगा॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 480) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/54/52/