श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.55

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

नरा नार्यश्‍च मुदिताः प्रमृष्टमणिकुण्डलाः।

पारिबर्हमुपाजह्रुर्वरयोश्‍चित्रवाससोः ॥ ५५✎ 1175

narā nāryaśca muditāḥ pramṛṣṭamaṇikuṇḍalāḥ|

pāribarhamupājahrurvarayościtravāsasoḥ || 55

अर्थ

वहाँके सभी नर-नारी मणियोंके चमकीले कुण्डल धारण किये हुए थे। उन्होंने आनन्दसे भरकर चित्र-विचित्र वस्त्र पहने दूल्हा और दुलहिनको अनेकों भेंटकी सामग्रियाँ उपहारमें दीं॥ ५५॥✎ 892 1689

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #892 शब्दोंके बीचका स्थान: लगा।क्यों → लगा। क्यों
  • #1175 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पारिबर्हमुपाजहृर्वरयोश्‍चित्रवाससो: → पारिबर्हमुपाजह्रुर्वरयोश्‍चित्रवाससोः
  • #1689 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: द्वारका-पुरीमें → द्वारकापुरीमें

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें