वहाँके सभी नर-नारी मणियोंके चमकीले कुण्डल धारण किये हुए थे। उन्होंने आनन्दसे भरकर चित्र-विचित्र वस्त्र पहने दूल्हा और दुलहिनको अनेकों भेंटकी सामग्रियाँ उपहारमें दीं॥ ५५॥✎ 8921689
नरा नार्यश्च मुदिताः प्रमृष्टमणिकुण्डलाः।
पारिबर्हमुपाजह्रुर्वरयोश्चित्रवाससोः ॥ ५५
वहाँके सभी नर-नारी मणियोंके चमकीले कुण्डल धारण किये हुए थे। उन्होंने आनन्दसे भरकर चित्र-विचित्र वस्त्र पहने दूल्हा और दुलहिनको अनेकों भेंटकी सामग्रियाँ उपहारमें दीं॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 480) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/54/55/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)