श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.54.56

दशम स्कन्ध · अध्याय 54 · अथ चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सा वृष्णिपुर्युत्तभितेन्द्रकेतुभि-

र्विचित्रमाल्याम्बररत्‍नतोरणैः ।

बभौ प्रतिद्वार्युपक्लृप्तमंगलै-
रापूर्णकुम्भागुरुधूपदीपकैः ॥ ५६

sā vṛṣṇipuryuttabhitendraketubhi-

rvicitramālyāmbararatnatoraṇaiḥ |

babhau pratidvāryupaklṛptamaṃgalai-

rāpūrṇakumbhāgurudhūpadīpakaiḥ || 56

अर्थ

उस समय द्वारकाकी अपूर्व शोभा हो रही थी। कहीं बड़ी-बड़ी पताकाएँ बहुत ऊँचेतक फहरा रही थीं। चित्र-विचित्र मालाएँ, वस्त्र और रत्‍नोंके तोरन बँधे हुए थे। द्वार-द्वारपर दूब, खील आदि मंगलकी वस्तुएँ सजायी हुई थीं। जलभरे कलश, अरगजा और धूपकी सुगन्ध तथा दीपावलीसे बड़ी ही विलक्षण शोभा हो रही थी॥ ५६॥✎ 892 1689

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #892 शब्दोंके बीचका स्थान: लगा।क्यों → लगा। क्यों
  • #1689 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: द्वारका-पुरीमें → द्वारकापुरीमें

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