मित्र नरपति आमन्त्रित किये गये थे। उनके मतवाले हाथियोंके मदसे द्वारकाकी सड़क और गलियोंका छिड़काव हो गया था। प्रत्येक दरवाजेपर केलोंके खंभे और सुपारीके पेड़ रोपे हुए बहुत ही भले मालूम होते थे॥ ५७॥✎ 8921689
सिक्तमार्गा मदच्युद्भिराहूतप्रेष्ठभूभुजाम्।
गजैर्द्वास्सु परामृष्टरम्भापूगोपशोभिता॥ ५७
मित्र नरपति आमन्त्रित किये गये थे। उनके मतवाले हाथियोंके मदसे द्वारकाकी सड़क और गलियोंका छिड़काव हो गया था। प्रत्येक दरवाजेपर केलोंके खंभे और सुपारीके पेड़ रोपे हुए बहुत ही भले मालूम होते थे॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.54.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 480) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/54/57/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)