श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

रतिरुवाच

भवान् नारायणसुतः शम्बरेणाहृतो गृहात्।

अहं तेऽधिकृता पत्‍नी रतिः कामो भवान् प्रभो॥ १२

bhavān nārāyaṇasutaḥ śambareṇāhṛto gṛhāt|

ahaṃ te'dhikṛtā patnī ratiḥ kāmo bhavān prabho|| 12

अर्थ

रतिने कहा—‘प्रभो! आप स्वयं भगवान् नारायणके पुत्र हैं। शम्बरासुर आपको सूतिकागृहसे चुरा लाया था। आप मेरे पति स्वयं कामदेव हैं और मैं आपकी सदाकी धर्म-पत्‍नी रति हूँ॥ १२॥

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