देवतालोग पुष्पोंकी वर्षा करते हुए स्तुति करने लगे और इसके बाद मायावती रति, जो आकाशमें चलना जानती थी, अपने पति प्रद्युम्नजीको आकाशमार्गसे द्वारकापुरीमें ले गयी॥ २५॥✎ 2113
आकीर्यमाणो दिविजैः स्तुवद्भिः कुसुमोत्करैः।
भार्ययाम्बरचारिण्या पुरं नीतो विहायसा॥ २५
देवतालोग पुष्पोंकी वर्षा करते हुए स्तुति करने लगे और इसके बाद मायावती रति, जो आकाशमें चलना जानती थी, अपने पति प्रद्युम्नजीको आकाशमार्गसे द्वारकापुरीमें ले गयी॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 484) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/55/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)