kṛṣṇaṃ matvā striyo hrītā nililyustatra tatra ha|| 28
अर्थ
अन्तःपुरकी नारियोंने देखा कि प्रद्युम्नजीका शरीर वर्षाकालीन मेघके समान श्यामवर्ण है। रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए हैं। घुटनोंतक लंबी भुजाएँ हैं। रतनारे नेत्र हैं और सुन्दर मुखपर मन्द-मन्द मुसकानकी अनूठी ही छटा है। उनके मुखारविन्दपर घुँघराली और नीली अलकें इस प्रकार शोभायमान हो रही हैं, मानो भौंरें खेल रहे हों। वे सब उन्हें श्रीकृष्ण समझकर सकुचा गयीं और घरोंमें इधर-उधर लुक-छिप गयीं॥ २७-२८॥✎ 1690
यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
स्वलंकृतमुखाम्भोजं नीलवक्रालकालिभिः।
कृष्णं मत्वा स्त्रियो ह्रीता निलिल्युस्तत्र तत्र ह॥ २८
अन्तःपुरकी नारियोंने देखा कि प्रद्युम्नजीका शरीर वर्षाकालीन मेघके समान श्यामवर्ण है। रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए हैं। घुटनोंतक लंबी भुजाएँ हैं। रतनारे नेत्र हैं और सुन्दर मुखपर मन्द-मन्द मुसकानकी अनूठी ही छटा है। उनके मुखारविन्दपर घुँघराली और नीली अलकें इस प्रकार शोभायमान हो रही हैं, मानो भौंरें खेल रहे हों। वे सब उन्हें श्रीकृष्ण समझकर सकुचा गयीं और घरोंमें इधर-उधर लुक-छिप गयीं॥ २७-२८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 484) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/55/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1177 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृता → ह्रीता