फिर धीरे-धीरे स्त्रियोंको यह मालूम हो गया कि ये श्रीकृष्ण नहीं हैं। क्योंकि उनकी अपेक्षा इनमें कुछ विलक्षणता अवश्य है। अब वे अत्यन्त आनन्द और विस्मयसे भरकर इस श्रेष्ठ दम्पतिके पास आ गयीं॥ २९॥✎ 1690
अवधार्य शनैरीषद्वैलक्षण्येन योषितः।
उपजग्मुः प्रमुदिताः सस्त्रीरत्नं सुविस्मिताः॥ २९
फिर धीरे-धीरे स्त्रियोंको यह मालूम हो गया कि ये श्रीकृष्ण नहीं हैं। क्योंकि उनकी अपेक्षा इनमें कुछ विलक्षणता अवश्य है। अब वे अत्यन्त आनन्द और विस्मयसे भरकर इस श्रेष्ठ दम्पतिके पास आ गयीं॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 484) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/55/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)