रुक्मिणीजी सोचने लगीं—‘यह नररत्न कौन है? यह कमलनयन किसका पुत्र है? किस बड़भागिनीने इसे अपने गर्भमें धारण किया होगा? इसे यह कौन सौभाग्यवती पत्नी-रूपमें प्राप्त हुई है?॥ ३१॥
को न्वयं नरवैदूर्यः कस्य वा कमलेक्षणः।
धृतः कया वा जठरे केयं लब्धा त्वनेन वा॥ ३१
रुक्मिणीजी सोचने लगीं—‘यह नररत्न कौन है? यह कमलनयन किसका पुत्र है? किस बड़भागिनीने इसे अपने गर्भमें धारण किया होगा? इसे यह कौन सौभाग्यवती पत्नी-रूपमें प्राप्त हुई है?॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 484) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/55/31/