श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

दिने दिने स्वर्णभारानष्टौ स सृजति प्रभो।

दुर्भिक्षमार्यरिष्टानि सर्पाधिव्याधयोऽशुभाः।

न सन्ति मायिनस्तत्र यत्रास्तेऽभ्यर्चितो मणिः॥ ११

dine dine svarṇabhārānaṣṭau sa sṛjati prabho|

durbhikṣamāryariṣṭāni sarpādhivyādhayo'śubhāḥ|

na santi māyinastatra yatrāste'bhyarcito maṇiḥ|| 11

अर्थ

परीक्षित्! वह मणि प्रतिदिन आठ भार* सोना दिया करती थी। और जहाँ वह पूजित होकर रहती थी वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीडा, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक व्यथा तथा मायावियोंका उपद्रव आदि कोई भी अशुभ नहीं होता था॥ ११॥✎ 1691

टिप्पणियाँ

  1. *

    भारका परिमाण इस प्रकार है—

    चतुर्भिर्व्रीहिभिर्गुंजं गुंजान्पंच पणं पणान्।

    अष्टौ धरणमष्टौ च कर्षं तांश्‍चतुरः पलम्।

    तुलां पलशतं प्राहुर्भारं स्याद्विंशतिस्तुलाः॥

    अर्थात् ‘चार व्रीहि (धान) की एक गुंजा, पाँच गुंजाका एक पण, आठ पणका एक धरण, आठ धरणका एक कर्ष, चार कर्षका एक पल, सौ पलकी एक तुला और बीस तुलाका एक भार कहलाता है।’

     

    (मुद्रित पृष्ठ 487)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1691 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: माया-वियोंका → मायावियोंका

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