श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

स याचितो मणिं क्वापि यदुराजाय शौरिणा।

नैवार्थकामुकः प्रादाद् याच्ञाभंगमतर्कयन्॥ १२

sa yācito maṇiṃ kvāpi yadurājāya śauriṇā|

naivārthakāmukaḥ prādād yācñābhaṃgamatarkayan|| 12

अर्थ

एक बार भगवान् श्रीकृष्णने प्रसंगवश कहा—‘सत्राजित्! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेनको दे दो।’ परन्तु वह इतना अर्थलोलुप—लोभी था कि भगवान्‌की आज्ञाका उल्लंघन होगा, इसका कुछ भी विचार न करके उसे अस्वीकार कर दिया॥ १२॥✎ 1691

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1691 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: माया-वियोंका → मायावियोंका

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