एक दिन सत्राजित्के भाई प्रसेनने उस परम प्रकाशमयी मणिको अपने गलेमें धारण कर लिया और फिर वह घोड़ेपर सवार होकर शिकार खेलने वनमें चला गया॥ १३॥
तमेकदा मणिं कण्ठे प्रतिमुच्य महाप्रभम्।
प्रसेनो हयमारुह्य मृगयां व्यचरद् वने॥ १३
एक दिन सत्राजित्के भाई प्रसेनने उस परम प्रकाशमयी मणिको अपने गलेमें धारण कर लिया और फिर वह घोड़ेपर सवार होकर शिकार खेलने वनमें चला गया॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.56.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 487) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/13/