श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

दास्ये दुहितरं तस्मै स्त्रीरत्‍नं रत्‍नमेव च।

उपायोऽयं समीचीनस्तस्य शान्तिर्न चान्यथा॥ ४२

dāsye duhitaraṃ tasmai strīratnaṃ ratnameva ca|

upāyo'yaṃ samīcīnastasya śāntirna cānyathā|| 42

अर्थ

अब मैं रमणियोंमें रत्‍नके समान अपनी कन्या सत्यभामा और वह स्यमन्तकमणि दोनों ही श्रीकृष्णको दे दूँ। यह उपाय बहुत अच्छा है। इसीसे मेरे अपराधका मार्जन हो सकता है, और कोई उपाय नहीं है’॥ ४२॥

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