श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.56.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 56 · अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

एवं व्यवसितो बुद्ध्या सत्राजित् स्वसुतां शुभाम्।

मणिं च स्वयमुद्यम्य कृष्णायोपजहार ह॥ ४३ ✎ 1179 1180

evaṃ vyavasito buddhyā satrājit svasutāṃ śubhām|

maṇiṃ ca svayamudyamya kṛṣṇāyopajahāra ha|| 43

अर्थ

सत्राजित्‍ने अपनी विवेक-बुद्धिसे ऐसा निश्‍चय करके स्वयं ही इसके लिये उद्योग किया और अपनी कन्या तथा स्यमन्तकमणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्णको अर्पण कर दीं॥ ४३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1179 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मण्ंि → मण्ं
  • #1180 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मण्ं → मणिं

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