मणिं च स्वयमुद्यम्य कृष्णायोपजहार ह॥ ४३ ✎ 11791180
evaṃ vyavasito buddhyā satrājit svasutāṃ śubhām|
maṇiṃ ca svayamudyamya kṛṣṇāyopajahāra ha|| 43
अर्थ
सत्राजित्ने अपनी विवेक-बुद्धिसे ऐसा निश्चय करके स्वयं ही इसके लिये उद्योग किया और अपनी कन्या तथा स्यमन्तकमणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्णको अर्पण कर दीं॥ ४३॥
एवं व्यवसितो बुद्ध्या सत्राजित् स्वसुतां शुभाम्।
मणिं च स्वयमुद्यम्य कृष्णायोपजहार ह॥ ४३
सत्राजित्ने अपनी विवेक-बुद्धिसे ऐसा निश्चय करके स्वयं ही इसके लिये उद्योग किया और अपनी कन्या तथा स्यमन्तकमणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्णको अर्पण कर दीं॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.56.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 490) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/56/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)