तुम जानते हो कि कंस उन्हींसे द्वेष करनेके कारण राज्यलक्ष्मीको खो बैठा और अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया। जरासन्ध-जैसे शूरवीरको भी उनके सामने सत्रह बार मैदानमें हारकर बिना रथके ही अपनी राजधानीमें लौट जाना पड़ा था’॥ १३॥✎ 1692
कंसः सहानुगोऽपीतो यद्द्वेषात्त्याजितः श्रिया।
जरासन्धः सप्तदश संयुगान् विरथो गतः॥ १३
तुम जानते हो कि कंस उन्हींसे द्वेष करनेके कारण राज्यलक्ष्मीको खो बैठा और अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया। जरासन्ध-जैसे शूरवीरको भी उनके सामने सत्रह बार मैदानमें हारकर बिना रथके ही अपनी राजधानीमें लौट जाना पड़ा था’॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.57.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 493) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/57/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)