श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तथापि दुर्धरस्त्वन्यैस्त्वय्यास्तां सुव्रते मणिः।

किन्तु मामग्रजः सम्यङ् न प्रत्येति मणिं प्रति॥ ३८

tathāpi durdharastvanyaistvayyāstāṃ suvrate maṇiḥ|

kintu māmagrajaḥ samyaṅ na pratyeti maṇiṃ prati|| 38

अर्थ

इस प्रकार शास्त्रीय दृष्टिसे यद्यपि स्यमन्तकमणि हमारे पुत्रोंको ही मिलनी चाहिये, तथापि वह मणि आपके ही पास रहे। क्योंकि आप बड़े व्रतनिष्ठ और पवित्रात्मा हैं तथा दूसरोंके लिये उस मणिको रखना अत्यन्त कठिन भी है। परन्तु हमारे सामने एक बहुत बड़ी कठिनाई यह आ गयी है कि हमारे बड़े भाई बलरामजी मणिके सम्बन्धमें मेरी बातका पूरा विश्‍वास नहीं करते॥ ३८॥

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