श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.57.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 57 · अथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

दर्शयस्व महाभाग बन्धूनां शान्तिमावह।

अव्युच्छिन्‍ना मखास्तेऽद्य वर्तन्ते रुक्मवेदयः॥ ३९

darśayasva mahābhāga bandhūnāṃ śāntimāvaha|

avyucchinnā makhāste'dya vartante rukmavedayaḥ|| 39

अर्थ

इसलिये महाभाग्यवान् अक्रूरजी! आप वह मणि दिखाकर हमारे इष्ट-मित्र—बलरामजी, सत्यभामा और जाम्बवतीका सन्देह दूर कर दीजिये और उनके हृदयमें शान्तिका संचार कीजिये। हमें पता है कि उसी मणिके प्रतापसे आजकल आप लगातार ही ऐसे यज्ञ करते रहते हैं, जिनमें सोनेकी वेदियाँ बनती हैं’॥ ३९॥

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