॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.57.4
योऽस्मभ्यं संप्रतिश्रुत्य कन्यारत्नं विगर्ह्य नः।
कृष्णायादान्न सत्राजित् कस्माद् भ्रातरमन्वियात्॥ ४
yo'smabhyaṃ saṃpratiśrutya kanyāratnaṃ vigarhya naḥ|
kṛṣṇāyādānna satrājit kasmād bhrātaramanviyāt|| 4
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्णके हस्तिनापुर चले जानेसे द्वारकामें अक्रूर और कृतवर्माको अवसर मिल गया। उन लोगोंने शतधन्वासे आकर कहा—‘तुम सत्राजित्से मणि क्यों नहीं छीन लेते?॥ ३॥ सत्राजित्ने अपनी श्रेष्ठ कन्या सत्यभामाका विवाह हमसे करनेका वचन दिया था और अब उसने हमलोगोंका तिरस्कार करके उसे श्रीकृष्णके साथ व्याह दिया है। अब सत्राजित् भी अपने भाई प्रसेनकी तरह क्यों न यमपुरीमें जाय?’॥ ४॥ शतधन्वा पापी था और अब तो उसकी मृत्यु भी उसके सिरपर नाच रही थी। अक्रूर और कृतवर्माके इस प्रकार बहकानेपर शतधन्वा उनकी बातोंमें आ गया और उस महादुष्टने लोभवश सोये हुए सत्राजित्को मार डाला॥ ५॥ इस समय स्त्रियाँ अनाथके समान रोने-चिल्लाने लगीं; परन्तु शतधन्वाने उनकी ओर तनिक भी ध्यान न दिया; जैसे कसाई पशुओंकी हत्या कर डालता है, वैसे ही वह सत्राजित्को मारकर और मणि लेकर वहाँसे चम्पत हो गया॥ ६॥