श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

मयश्‍च मोचितो वह्नेः सभां सख्य उपाहरत्।

यस्मिन् दुर्योधनस्यासीज्जलस्थलदृशिभ्रमः॥ २७

mayaśca mocito vahneḥ sabhāṃ sakhya upāharat|

yasmin duryodhanasyāsījjalasthaladṛśibhramaḥ|| 27

अर्थ

खाण्डव-दाहके समय अर्जुनने मय दानवको जलनेसे बचा लिया था। इसलिये उसने अर्जुनसे मित्रता करके उनके लिये एक परम अद्भुत सभा बना दी। उसी सभामें दुर्योधनको जलमें स्थल और स्थलमें जलका भ्रम हो गया था॥ २७॥

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