श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

किं त्वस्माभिः कृतः पूर्वं समयः सात्वतर्षभ।

पुंसां वीर्यपरीक्षार्थं कन्यावरपरीप्सया॥ ४२

kiṃ tvasmābhiḥ kṛtaḥ pūrvaṃ samayaḥ sātvatarṣabha|

puṃsāṃ vīryaparīkṣārthaṃ kanyāvaraparīpsayā|| 42

अर्थ

परन्तु यदुवंशशिरोमणे! हमने पहले ही इस विषयमें एक प्रण कर लिया है। कन्याके लिये कौन-सा वर उपयुक्त है, उसका बल-पौरुष कैसा है—इत्यादि बातें जाननेके लिये ही ऐसा किया गया है॥ ४२॥

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