श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.58.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 58 · अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सप्तैते गोवृषा वीर दुर्दान्ता दुरवग्रहाः।

एतैर्भ‌ग्‍नाः सुबहवो भिन्‍नगात्रा नृपात्मजाः॥ ४३

saptaite govṛṣā vīra durdāntā duravagrahāḥ|

etairbhagnāḥ subahavo bhinnagātrā nṛpātmajāḥ|| 43

अर्थ

वीरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण! हमारे ये सातों बैल किसीके वशमें न आनेवाले और बिना सधाये हुए हैं। इन्होंने बहुत-से राजकुमारोंके अंगोंको खण्डित करके उनका उत्साह तोड़ दिया है॥ ४३॥

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