श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

व्यसुः पपाताम्भसि कृत्तशीर्षो

निकृत्तशृंगोऽद्रिरिवेन्द्रतेजसा ।

तस्यात्मजाः सप्त पितुर्वधातुराः

प्रतिक्रियामर्षजुषः समुद्यताः॥ ११

vyasuḥ papātāmbhasi kṛttaśīrṣo

nikṛttaśṛṃgo'dririvendratejasā |

tasyātmajāḥ sapta piturvadhāturāḥ

pratikriyāmarṣajuṣaḥ samudyatāḥ|| 11

अर्थ

सिर कटते ही मुर दैत्यके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह ठीक वैसे ही जलमें गिर पड़ा, जैसे इन्द्रके वज्रसे शिखर कट जानेपर कोई पर्वत समुद्रमें गिर पड़ा हो। मुर दैत्यके सात पुत्र थे—ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, वसु, नभस्वान् और अरुण। ये अपने पिताकी मृत्युसे अत्यन्त शोकाकुल हो उठे और फिर बदला लेनेके लिये क्रोधसे भरकर शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित हो गये तथा पीठ नामक दैत्यको अपना सेनापति बनाकर भौमासुरके आदेशसे श्रीकृष्णपर चढ़ आये॥ ११-१२॥

यह अर्थ श्लोक 11–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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