श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

ताम्रोऽन्तरिक्षः श्रवणो विभावसु-

र्वसुर्नभस्वानरुणश्‍च सप्तमः।

पीठं पुरस्कृत्य चमूपतिं मृधे

भौमप्रयुक्ता निरगन् धृतायुधाः॥ १२

tāmro'ntarikṣaḥ śravaṇo vibhāvasu-

rvasurnabhasvānaruṇaśca saptamaḥ|

pīṭhaṃ puraskṛtya camūpatiṃ mṛdhe

bhaumaprayuktā niragan dhṛtāyudhāḥ|| 12

अर्थ

सिर कटते ही मुर दैत्यके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह ठीक वैसे ही जलमें गिर पड़ा, जैसे इन्द्रके वज्रसे शिखर कट जानेपर कोई पर्वत समुद्रमें गिर पड़ा हो। मुर दैत्यके सात पुत्र थे—ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, वसु, नभस्वान् और अरुण। ये अपने पिताकी मृत्युसे अत्यन्त शोकाकुल हो उठे और फिर बदला लेनेके लिये क्रोधसे भरकर शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित हो गये तथा पीठ नामक दैत्यको अपना सेनापति बनाकर भौमासुरके आदेशसे श्रीकृष्णपर चढ़ आये॥ ११-१२॥

यह अर्थ श्लोक 11–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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