शरणागत-भय-भंजन प्रभो! मेरे पुत्र भौमासुरका यह पुत्र भगदत्त अत्यन्त भयभीत हो रहा है। मैं इसे आपके चरणकमलोंकी शरणमें ले आयी हूँ। प्रभो! आप इसकी रक्षा कीजिये और इसके सिरपर अपना वह करकमल रखिये जो सारे जगत्के समस्त पाप-तापोंको नष्ट करनेवाला है॥ ३१॥✎ 1694
तस्यात्मजोऽयं तव पादपंकजं
भीतः प्रपन्नार्तिहरोपसादितः।
तत् पालयैनं कुरु हस्तपंकजं
शिरस्यमुष्याखिलकल्मषापहम् ॥ ३१
शरणागत-भय-भंजन प्रभो! मेरे पुत्र भौमासुरका यह पुत्र भगदत्त अत्यन्त भयभीत हो रहा है। मैं इसे आपके चरणकमलोंकी शरणमें ले आयी हूँ। प्रभो! आप इसकी रक्षा कीजिये और इसके सिरपर अपना वह करकमल रखिये जो सारे जगत्के समस्त पाप-तापोंको नष्ट करनेवाला है॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.59.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 508) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/59/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)