श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.59.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 59 · अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः

तस्यात्मजोऽयं तव पादपंकजं

भीतः प्रपन्‍नार्तिहरोपसादितः।

तत् पालयैनं कुरु हस्तपंकजं

शिरस्यमुष्याखिलकल्मषापहम् ॥ ३१

tasyātmajo'yaṃ tava pādapaṃkajaṃ

bhītaḥ prapannārtiharopasāditaḥ|

tat pālayainaṃ kuru hastapaṃkajaṃ

śirasyamuṣyākhilakalmaṣāpaham || 31

अर्थ

शरणागत-भय-भंजन प्रभो! मेरे पुत्र भौमासुरका यह पुत्र भगदत्त अत्यन्त भयभीत हो रहा है। मैं इसे आपके चरणकमलोंकी शरणमें ले आयी हूँ। प्रभो! आप इसकी रक्षा कीजिये और इसके सिरपर अपना वह करकमल रखिये जो सारे जगत‍्के समस्त पाप-तापोंको नष्ट करनेवाला है॥ ३१॥✎ 1694

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1694 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्व-रूपमें → स्वरूपमें

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