श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब पृथ्वीने भक्तिभावसे विनम्र होकर इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति-प्रार्थना की, तब उन्होंने भगदत्तको अभयदान दिया और भौमासुरके समस्त सम्पत्तियोंसे सम्पन्न महलमें प्रवेश किया॥ ३२॥
इति भूम्यार्थितो वाग्भिर्भगवान् भक्तिनम्रया।
दत्त्वाभयं भौमगृहं प्राविशत् सकलर्द्धिमत्॥ ३२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब पृथ्वीने भक्तिभावसे विनम्र होकर इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति-प्रार्थना की, तब उन्होंने भगदत्तको अभयदान दिया और भौमासुरके समस्त सम्पत्तियोंसे सम्पन्न महलमें प्रवेश किया॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.59.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 508) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/59/32/