श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.6.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

न यत्र श्रवणादीनि रक्षोघ्नानि स्वकर्मसु।

कुर्वन्ति सात्वतां भर्तुर्यातुधान्यश्‍च तत्र हि॥ ३

na yatra śravaṇādīni rakṣoghnāni svakarmasu|

kurvanti sātvatāṃ bharturyātudhānyaśca tatra hi|| 3

अर्थ

जहाँके लोग अपने प्रतिदिनके कामोंमें राक्षसोंके भयको दूर भगानेवाले भक्तवत्सल भगवान्‌के नाम, गुण और लीलाओंका श्रवण, कीर्तन और स्मरण नहीं करते—वहीं ऐसी राक्षसियोंका बल चलता है॥ ३॥✎ 1654

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1654 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कुच-कलश → कुचकलश

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें