कुर्वन्ति सात्वतां भर्तुर्यातुधान्यश्च तत्र हि॥ ३
na yatra śravaṇādīni rakṣoghnāni svakarmasu|
kurvanti sātvatāṃ bharturyātudhānyaśca tatra hi|| 3
अर्थ
जहाँके लोग अपने प्रतिदिनके कामोंमें राक्षसोंके भयको दूर भगानेवाले भक्तवत्सल भगवान्के नाम, गुण और लीलाओंका श्रवण, कीर्तन और स्मरण नहीं करते—वहीं ऐसी राक्षसियोंका बल चलता है॥ ३॥✎ 1654
न यत्र श्रवणादीनि रक्षोघ्नानि स्वकर्मसु।
कुर्वन्ति सात्वतां भर्तुर्यातुधान्यश्च तत्र हि॥ ३
जहाँके लोग अपने प्रतिदिनके कामोंमें राक्षसोंके भयको दूर भगानेवाले भक्तवत्सल भगवान्के नाम, गुण और लीलाओंका श्रवण, कीर्तन और स्मरण नहीं करते—वहीं ऐसी राक्षसियोंका बल चलता है॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.6.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 155) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/6/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)