श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.6.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

तां केशबन्धव्यतिषक्तमल्लिकां

बृहन्‍नितम्बस्तनकृच्छ्रमध्यमाम् ।

सुवाससं कम्पितकर्णभूषण-

त्विषोल्लसत्कुन्तलमण्डिताननाम्॥ ५

tāṃ keśabandhavyatiṣaktamallikāṃ

bṛhannitambastanakṛcchramadhyamām |

suvāsasaṃ kampitakarṇabhūṣaṇa-

tviṣollasatkuntalamaṇḍitānanām|| 5

अर्थ

उसने बड़ा सुन्दर रूप बनाया था। उसकी चोटियोंमें बेलेके फूल गुँथे हुए थे। सुन्दर वस्त्र पहने हुए थी। जब उसके कर्णफूल हिलते थे, तब उनकी चमकसे मुखकी ओर लटकी हुई अलकें और भी शोभायमान हो जाती थीं। उसके नितम्ब और कुचकलश ऊँचे-ऊँचे थे और कमर पतली थी॥ ५॥✎ 1654

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1654 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कुच-कलश → कुचकलश

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