॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.60.15
ययोरात्मसमं वित्तं जन्मैश्वर्याकृतिर्भवः।
तयोर्विवाहो मैत्री च नोत्तमाधमयोः क्वचित्॥ १५
yayorātmasamaṃ vittaṃ janmaiśvaryākṛtirbhavaḥ|
tayorvivāho maitrī ca nottamādhamayoḥ kvacit|| 15
अर्थ
जिनका धन, कुल, ऐश्वर्य, सौन्दर्य और आय अपने समान होती है—उन्हींसे विवाह और मित्रताका सम्बन्ध करना चाहिये। जो अपनेसे श्रेष्ठ या अधम हों, उनसे नहीं करना चाहिये॥ १५॥✎ 1438