विदर्भराजकुमारी! तुमने अपनी अदूरदर्शिताके कारण इन बातोंका विचार नहीं किया और बिना जाने-बूझे भिक्षुकोंसे मेरी झूठी प्रशंसा सुनकर मुझ गुणहीनको वरण कर लिया॥ १६॥✎ 1438
वैदर्भ्येतदविज्ञाय त्वयादीर्घसमीक्षया।
वृता वयं गुणैर्हीना भिक्षुभिः श्लाघिता मुधा॥ १६
विदर्भराजकुमारी! तुमने अपनी अदूरदर्शिताके कारण इन बातोंका विचार नहीं किया और बिना जाने-बूझे भिक्षुकोंसे मेरी झूठी प्रशंसा सुनकर मुझ गुणहीनको वरण कर लिया॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 512) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1438 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विदर्भ-राजकुमारी! → विदर्भराजकुमारी!