श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! जब भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्राणप्रियाको इस प्रकार समझाया-बुझाया, तब उन्हें इस बातका विश्वास हो गया कि मेरे प्रियतमने केवल परिहासमें ही ऐसा कहा था। अब उनके हृदयसे यह भय जाता रहा कि प्यारे हमें छोड़ देंगे॥ ३२॥
सैवं भगवता राजन् वैदर्भी परिसान्त्विता।
ज्ञात्वा तत्परिहासोक्तिं प्रियत्यागभयं जहौ॥ ३२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! जब भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्राणप्रियाको इस प्रकार समझाया-बुझाया, तब उन्हें इस बातका विश्वास हो गया कि मेरे प्रियतमने केवल परिहासमें ही ऐसा कहा था। अब उनके हृदयसे यह भय जाता रहा कि प्यारे हमें छोड़ देंगे॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 514) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/60/32/