॥ श्रीहरिः ॥
बभाष ऋषभं पुंसां वीक्षन्ती भगवन्मुखम्।
सव्रीडहासरुचिरस्निग्धापांगेन भारत॥ ३३
babhāṣa ṛṣabhaṃ puṃsāṃ vīkṣantī bhagavanmukham|
savrīḍahāsarucirasnigdhāpāṃgena bhārata|| 33
अर्थ
परीक्षित्! अब वे सलज्ज हास्य और प्रेमपूर्ण मधुर चितवनसे पुरुषभूषण भगवान् श्रीकृष्णका मुखारविन्द निरखती हुई उनसे कहने लगीं—॥ ३३॥
बभाष ऋषभं पुंसां वीक्षन्ती भगवन्मुखम्।
सव्रीडहासरुचिरस्निग्धापांगेन भारत॥ ३३
परीक्षित्! अब वे सलज्ज हास्य और प्रेमपूर्ण मधुर चितवनसे पुरुषभूषण भगवान् श्रीकृष्णका मुखारविन्द निरखती हुई उनसे कहने लगीं—॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 514) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/60/33/