श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.60.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 60 · अथ षष्टितमोऽध्यायः

अस्त्वम्बुजाक्ष मम ते चरणानुराग

आत्मन् रतस्य मयि चानतिरिक्तदृष्टेः।

यर्ह्यस्य वृद्धय उपात्तरजोऽतिमात्रो

मामीक्षसे तदु ह नः परमानुकम्पा॥ ४६

astvambujākṣa mama te caraṇānurāga

ātman ratasya mayi cānatiriktadṛṣṭeḥ|

yarhyasya vṛddhaya upāttarajo'timātro

māmīkṣase tadu ha naḥ paramānukampā|| 46

अर्थ

कमलनयन! आप आत्माराम हैं। मैं सुन्दरी अथवा गुणवती हूँ, इन बातोंपर आपकी दृष्टि नहीं जाती। अतः आपका उदासीन रहना स्वाभाविक है, फिर भी आपके चरणकमलोंमें मेरा सुदृढ़ अनुराग हो, यही मेरी अभिलाषा है। जब आप इस संसारकी अभिवृद्धिके लिये उत्कट रजोगुण स्वीकार करके मेरी ओर देखते हैं, तब वह भी आपका परम अनुग्रह ही है॥ ४६॥

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