अम्बाया इव हि प्रायः कन्यायाः स्याद् रतिः क्वचित्॥ ४७
naivālīkamahaṃ manye vacaste madhusūdana|
ambāyā iva hi prāyaḥ kanyāyāḥ syād ratiḥ kvacit|| 47
अर्थ
मधुसूदन! आपने कहा कि किसी अनुरूप वरको वरण कर लो। मैं आपकी इस बातको भी झूठ नहीं मानती। क्योंकि कभी-कभी एक पुरुषके द्वारा जीती जानेपर भी काशी-नरेशकी कन्या अम्बाके समान किसी-किसीकी दूसरे पुरुषमें भी प्रीति रहती है॥ ४७॥
नैवालीकमहं मन्ये वचस्ते मधुसूदन।
अम्बाया इव हि प्रायः कन्यायाः स्याद् रतिः क्वचित्॥ ४७
मधुसूदन! आपने कहा कि किसी अनुरूप वरको वरण कर लो। मैं आपकी इस बातको भी झूठ नहीं मानती। क्योंकि कभी-कभी एक पुरुषके द्वारा जीती जानेपर भी काशी-नरेशकी कन्या अम्बाके समान किसी-किसीकी दूसरे पुरुषमें भी प्रीति रहती है॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.60.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 518) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/60/47/